गुरुवार 29 जनवरी 2026 - 14:53
ईरान की हालिया घटनाओ में क्या हुआ?

हौज़ा / ईरान की जदीद तारीख़ में अगर कोई चीज़ तवातुर के साथ नज़र आती है, तो वो दहशतगर्दी के वाक़िआत हैं ऐसे वाक़िआत जिनमें आम शहरी, पढ़ा-लिखा तबक़ा, उलेमा, साइंसदान, दानिश्वर और रियासती ज़िम्मेदारान को मुनज़्ज़म अंदाज़ में निशाना बनाया गया। यह तमाम वाक़िआत क़त्ल-ए-आम नहीं थे, बल्कि टार्गेटेड दहशतगर्दी थी, जिसका मक़सद ईरान और उसके समाज को ख़ौफ़, अदम-ए-इस्तेहकाम और फ़िक्री मफ़लूजी की तरफ़ धकेलना था।

लेखकः मौलाना करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,ईरान की जदीद तारीख़ में अगर कोई चीज़ तवातुर के साथ नज़र आती है, तो वो दहशतगर्दी के वाक़िआत हैं ऐसे वाक़िआत जिनमें आम शहरी, पढ़ा-लिखा तबक़ा, उलेमा, साइंसदान, दानिश्वर और रियासती ज़िम्मेदारान को मुनज़्ज़म अंदाज़ में निशाना बनाया गया। यह तमाम वाक़िआत क़त्ल-ए-आम नहीं थे, बल्कि टार्गेटेड दहशतगर्दी थी, जिसका मक़सद ईरान और उसके समाज को ख़ौफ़, अदम-ए-इस्तेहकाम और फ़िक्री मफ़लूजी की तरफ़ धकेलना था।

क्या ईरान में नस्लकुशी का कोई वाक़िआ पेश आया?

दाइशी दहशतगर्दों के मुक़ाबले में ईरानी पुलिस का किरदार और कारकर्दगी क्या रही?

अगर इस बहस को संजीदगी और दियानत के साथ देखा जाए, तो सबसे पहली हक़ीक़त यही सामने आती है कि ईरान में इंकेलाब-ए-इस्लामी के बाद से नस्लकुशी के उनवान से कोई वाक़िआ कभी पेश ही नहीं आया। यह इस्तिलाह महज़ सियासी मक़ासिद के लिए इस्तेमाल की गई, ताकि हक़ाइक़ को धुंधला करके एक ख़ुद्दार रियासत को मुजरिम के कटघरे में खड़ा किया जा सके।

ईरान की मुआसिर तारीख़ में अगर कोई चीज़ मुसलसल नज़र आती है, तो वो दहशतगर्दी के वाक़िआत हैं ऐसे वाक़िआत जिनमें आम शहरी, तालीमयाफ़्ता तबक़ा, उलमा, साइंसदान, दानिश्वर और रियासती ज़िम्मेदारान को मुनज़्ज़म तरीक़े से निशाना बनाया गया।

यह क़त्ल-ए-आम नहीं थे, बल्कि टार्गेटेड दहशतगर्दी थी, जिसका मक़सद ईरान और उसके समाज को ख़ौफ़, बे-इस्तेहकाम और फ़िक्री मफ़लूजी की जानिब धकेलना था।ये दहशतगर्दी किसी अंदरूनी मज़ाहमत या अवामी रद्द-ए-अमल का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसके पस-ए-पुश्त अमरीका, इस्राईल और दीगर इस्तिमारी ताक़तों के मुनज़्ज़म नेटवर्क्स कारफ़रमा रहे।

अवामी इज्तिमाआत, मसाजिद, मज़ारात और शहरी मराक़िज़ को निशाना बनाना इस बात की वाज़ेह दलील है कि मक़सद न इस्लाह था और न इख़्तिलाफ़-ए-राय, बल्कि महज़ ख़ौफ़ फैलाना और ख़ूनरेज़ी के ज़रिए अफ़रातफ़री पैदा करना था।

इन हमलों में बच्चों, औरतों और बेगुनाह शहरीयों की जानें ली गईं, और इन जराइम के शवाहिद आज भी तस्वीरों और वीडियो की सूरत में दुनिया के सामने मौजूद हैं। ये तरीक़ा-ए-कार किसी रियासती निज़ाम की पहचान नहीं, बल्कि दाइश और अल-क़ायदा जैसे उन गिरोहों का तरीक़ा रहा है जो बिल-वास्ता तौर पर अमरीका और इस्राईल की सरपरस्ती में परवान चढ़े।

इन हालात में ईरान की पुलिस और सिक्योरिटी इदारों ने जो किरदार अदा किया, वो किसी क़ौम के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि दहशतगर्द नेटवर्क्स के ख़ात्मे के लिए था। पेशगी इंटेलिजेंस कार्रवाइयाँ, बरवक़्त गिरफ़्तारियाँ और मुतअद्दिद बड़े हमलों की नाकामी इस बात की गवाही देती हैं कि ये कार्रवाइयाँ अंधी ताक़त नहीं, बल्कि ज़िम्मेदाराना तहफ़्फ़ुज़ के उसूलों के तहत की गईं।

अगर रियासती नियत ज़ुल्म या कुचलने की होती, तो दहशतगर्दी के मराक़िज़ को तोड़ने, अवामी मक़ामात की हिफ़ाज़त करने और अपनी ही शहरी आबादी को बचाने की संजीदा कोशिशें नज़र न आतीं मगर हक़ीक़त इसके बिलकुल बरअक्स है।

असल मसला वहाँ पैदा होता है जहाँ कुछ आलमी ताक़तें हक़ाइक़ को उलट कर पेश करने की रविश अपनाती हैं। दहशतगर्द गिरोहों के साबितशुदा जराइम को नज़रअंदाज़ करके उन्हीं ख़ूनी कार्रवाइयों की ज़िम्मेदारी ईरानी सिक्योरिटी दस्तों पर डालने की कोशिश की जाती है, ताकि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ की जाने वाली मज़ाहमत को मश्कूक बनाया जा सके।

यह तरीक़ा-ए-फ़िक्र क़ातिल को मज़लूम और मोहाफ़िज़ को क़सूरवार साबित करने की एक पुरानी चाल है, जिसके पीछे अमरीका और इस्राईल जैसे मुमालिक का किरदार बार-बार ज़ेरे बहस आ चुका है।

इंसाफ़ का तक़ाज़ा यही है कि फ़ैसले अफ़वाहों या गैर-मुस्तनद दावों पर नहीं, बल्कि शवाहिद और ज़मीनी हक़ाइक़ की बुनियाद पर किए जाएँ। तस्वीरें, वीडियो और वाक़िआत का तससुल वाज़ेह करता है कि आम शहरीयों का क़त्ल, उलेमा और साइंसदानों की टार्गेटेड शहादतें और अवामी मक़ामात पर हमले दहशतगर्द तंज़ीमों का तरीक़ा रहे हैं, जबकि ईरान ने अपने शहरीयों और ख़ित्ते को इस मुसलसल फ़ित्ना-ओ-फ़साद से महफ़ूज़ रखने की ज़िम्मेदारी निभाई है।

वक़्त गुज़रने के साथ तारीख़ यही साबित करेगी कि दहशतगर्दी के मुक़ाबिल खड़ा होना किसी क़ौम पर ज़ुल्म नहीं, बल्कि इंसानी जानों के तहफ़्फ़ुज़ की नाक़ाबिल-ए-इनकार ज़िम्मेदारी है और ईरान का किरदार इसी हक़ीक़त की रौशन मिसाल है।

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